बाजार गिरावट के मुख्य कारण
शेयर बाजार ने 25 सितंबर को इतिहास के कुछ सबसे कठिन दिन देखे। BSE सेंसेक्स 555.95 अंक गिरकर अपनी पिछली बंद कीमत से नीचे रह गया, जबकि निफ्टी 24,900 के तकनीकी समर्थन स्तर से नीचे धकेल दिया गया। इस गहरी गिरावट के पीछे चार प्रमुख कारण उभर कर सामने आए हैं:
- एफआईआई आउटफ्लो: केवल एक दिन में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने 4,995.42 करोड़ रुपये की भारी बिक्री की। सितंबर माह में कुल आउटफ्लो 13,450 करोड़ रुपये रहा, जिससे 2025 में अब तक कुल 1,44,085 करोड़ रुपये की निरन्तर बिक्री हो चुकी है।
- रुपए की कमजोरी: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये ने 88.7975 के मौजूदा रेकॉर्ड लो को तोड़ते हुए 88.8 के ऊपर कायम रहना जारी रखा। इस निरंतर गिरावट ने विदेशी पूंजी को भारत से बाहर निकालने का इशारा दिया।
- वैश्विक टैरिफ और ट्रेड‑ऑफ फियर: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ब्रांडेड दवाओं पर 100% लेवी और भारी ट्रक पर 25% टैरिफ की घोषणा की। इस नीति ने फार्मा सेक्टर को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया, क्योंकि निवेशकों को अब चिंता है कि पैटेंटेड दवाओं को टैरिफ के तहत कैसे वर्गीकृत किया जाएगा।
- सुरक्षित परिसम्पत्ति में रुख: सोना और चांदी जैसी कीमती धातुओं की कीमतें पूरे साल में सर्वोच्च स्तर तक पहुंच गईं। 2025 में सोने की कीमतें 47% और चांदी की 58% बढ़ी हैं, जिससे निवेशक जोखिम‑भरी इक्विटीज़ से बचते हुए इन परिसम्पत्तियों की ओर रुख कर रहे हैं।
इन कारणों का सम्मिलित प्रभाव बाजार के गिरते रुझान को तेज़ कर रहा है, जिससे कई लख करोड़ का मूल्य क्षीण हुआ है। अब तक के आंकड़े दिखाते हैं कि मध्य‑अगस्त से मध्य‑सितंबर के बीच निफ्टी 24,700‑25,100 की तकनीकी रेंज से नीचे गिर गया।
प्रभाव और सरकारी कदम
सेंसेक्स और निफ्टी की लगातार गिरावट का असर सिर्फ सूचकांकों तक सीमित नहीं रहा। वित्तीय सेवाएँ, आईटी और फार्मास्यूटिकल सेक्टरों ने सबसे ज्यादा प्रभाव झेला। बैंकों में नॉन‑परफ़ॉर्मिंग एसेट्स (NPA) की संभावनाएँ बढ़ीं, जबकि कॉरपोरेट कमाई के अनुमान भी नीचे मर गए। छोटे‑छोटे रिटेल निवेशकों को बड़ी हानि का सामना करना पड़ा, जिससे निवेश‑विश्वास में एक बड़ी खाई बन गई।
इन चुनौतियों के जवाब में RBI ने तुरंत फॉरेक्स मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ा कर रुपये को स्थिर करने की कोशिश की। साथ ही, SEBI ने अत्यधिक वोलैटिलिटी को रोकने के लिए सर्किट‑ब्रेकर्स के लागू करने की सीमा को घटा दिया और बड़े शेयरधारकों से अचानक करके शेयर बेचने पर प्रतिबंध लगाया। सरकार भी आर्थिक स्थिरता को बहाल करने के लिये संभावित प्रोत्साहन पैकेज पर विचार कर रही है, जिसमें टैक्स में रियायतें और बड़े बैंकों को अतिरिक्त लिक्विडिटी प्रदान करना शामिल हो सकता है।
साथ ही, विशेषज्ञों ने कहा है कि यदि विदेशी निवेशकों की शमन न हो और रुपये की भावना में सुधार न हो तो बाजार को आगे भी अस्थिरता का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने निवेशकों को दीर्घकालिक पोर्टफोलियो बनाते समय विविधीकरण पर ज़ोर देने और सोने‑चांदी जैसे हेजिंग विकल्पों को संतुलित रूप से शामिल करने की सलाह दी।
अंततः, बाजार में स्थिरता लाने के लिये न केवल मौद्रिक नीति बल्कि संरचनात्मक सुधारों की भी जरूरत है। यदि नीति निर्माताओं ने रीफॉर्म, इन्फ्रास्ट्रक्चर निवेश और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में सुधार करने के लिये ठोस कदम उठाए, तो निवेशकों का भरोसा धीरे‑धीरे लौट सकता है। तब तक, निवेशकों को सतर्क रहना होगा और बाजार के रुझानों को निकटता से मॉनिटर करना चाहिए।
mahesh krishnan
सितंबर 27, 2025 AT 03:28Mahesh Goud
सितंबर 28, 2025 AT 03:19Ravi Roopchandsingh
सितंबर 29, 2025 AT 00:02हमने कितनी मेहनत की थी, अपने बच्चों के लिए पैसे बचाए थे, और अब ये सब धुंध में खो गया।
SEBI का circuit breaker? बस नाटक है।
जब तक हमारे नेता अपनी गाड़ियों की गिनती नहीं करेंगे, तब तक ये सब चलता रहेगा।
रुपया गिर रहा है? तो फिर अमेरिकी डॉलर को जलाओ! 💥
हमारे पास अपनी ताकत है। हमारे पास अपना इतिहास है। अब बस उठो और लड़ो।
dhawal agarwal
सितंबर 30, 2025 AT 16:32सोना और चांदी की ओर भागना आसान है, लेकिन असली बात ये है कि हम अपनी आर्थिक नीतियों को कैसे सुधारें।
बैंकों को लिक्विडिटी देना अच्छा है, लेकिन अगर हम शिक्षा, इन्फ्रास्ट्रक्चर और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में निवेश नहीं करेंगे, तो ये गिरावट दोबारा आएगी।
हम जितना जल्दी अपने आप को बाजार के बाहर निकालेंगे, उतना ही जल्दी हम अपनी असली ताकत ढूंढ पाएंगे।
इंतजार करो, बदलाव आएगा। बस थोड़ा धैर्य रखो।
Shalini Dabhade
अक्तूबर 1, 2025 AT 09:10